मिल जाए तो मिट्टी है

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जोदि तोर दोर्श्ने केउ ना आशे तौबे एकला चलो रे…

रबीन्द्र नाथ ठाकुर जी का लिखा बांग्ला गीत अमिताभ जी की आवाज़ में बज रहा है. रात आहिस्ता बढ़ रही है और खोल रही है एक एक कर वो सारे ताले जो मैंने कुछ सवालों पर लगाए हुए हैं. क्या सबके साथ चलते हुए भी तनहा चलना ही इन्सान की नियति है वो जिसे पा लेना एक सपने से ज्यादा कुछ न हो और न हासिल कर पाने का आभास मात्र आँखों के सामने अँधेरा कर दे, अगर वो मिल जाए और एक दिन वो होकर भी न रहे आसपास, क्या इससे बड़ी त्रासदी कोई होती होगी?

वो जिसके लिए कभी सारी दुनिया सिर्फ आपमें समाती हो, वो जिसे पाने के लिए आपने सचमुच सात आसमान एक किए हों, वो जो ईमानदार हो, पूरे सौ टके केवल आपका हो मगर एक अनकही मजबूरी के तहत, जो दवा तो हो मगर सांस में अटकी किसी छोटी गोली की तरह.

क्यों इस जहां में हम उनसे चाहते हुए भी इतना तक नहीं कह पाते कि आप आज़ाद हैं, कोई ज़ोर नहीं है.

मैंने एक कथा सुनी थी बचपन में शायद कोई व्रत कथा थी, बड़ी धुंधली सी याद है, एक व्यापारी था जो विदेश से अच्छी खासी कमाई करके जलमार्ग से अपने शहर की ओर लौट रहा था, उसका जहाज़ भटक जाता है. एक भिक्षुक उसकी पत्नी से ख्वाब में कहते हैं कि, तुम्हारे पति का जहाज़ भटक गया है तुम अमुक देवता की पूजा करो, तो वे लौट आएँगे, तब पुनः प्रतिसप्ताह उस एक विशेष दिन कथा का पाठ कर वही पूजा करना. वह धर्मपरायण स्त्री उनके कहे का पालन करती है और सचमुच उसके पति लौट आते हैं अपने भरे पूरे जहाज़ के साथ, परन्तु उसके बाद स्त्री कथा और पूजा करना भूल जाती है, तब उसके पति के जहाज़ पर मौजूद सारी धन सम्पदा घासफूस के ढेर में बदल जाती है.

मन पूछता है क्या हमारे भरे पूरे जहाज़ पर सारी दौलत का माटी हो जाना किसी रूठे देव का श्राप है?

‘दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है
अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है’

~निदा फ़ाज़ली

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