अनायास पड़ा थप्पड़

रात के पौने ग्यारह, काली रात में चमकता सिर्फ एक सितारा, कि सिर्फ तुम अकेली नहीं हो। 
हवा ठंडी, मंद और खामोश, तन के रोम रोम को छूकर गुज़रती हुई, एक एक बाल को छेड़कर जाती हुई, आहिस्ता आहिस्ता, जैसे कह रही हो शुक्र मानो कि अब भी कुछ बातों पर इंसान का ज़ोर नहीं चलता। 

हर ओर रौशनी की चौन्ध फिर भी आसमान काला ही रह गया है। लाख कोशिशें हों लेकिन कुछ चीज़ें छुपती नहीं हैं।

प्रेम शायद एक अनायास पड़ा थप्पड़ है, इंसान को जो न कुछ याद रहने दे और न कुछ भूलने दे बस झकझोर दे भीतर तक, कि खुली आँखों से देख सकें खुदा और कुदरत के हाथ खुद को कठपुतली बने हुए।

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दिल के मौसम में

तन्हाई की गर्मियाँ उतरते ही

जाग उठी हैं छिपकलियां

तुम्हारी याद की

रेंगती फिर रही हैं

इंतज़ार के हर कोने तक

*

आसमान में छूट गई है

एक क़तरा धूप

बादलों के घिरने के बावजूद

एक तुम हो

कोई ज़र्रा भी नहीं छोड़ा

*

हालाँकि मुझे मालूम है

नहीं पहुँच पाती 

मेरे होंठों की नर्मी तुम्हारे गालों तक

मगर न जाने कैसे

तुम ये जान जाते हो

तुम्हारी तस्वीर को चूमा था

मेरी आँखों ने अभी-अभी

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काश तस्वीरों की तरह कभी ज़िन्दगी को भी क्रॉप किया जा सकता।

 एक ख़याल और याद का फाहा

एक सायबान लड़कपन की कच्ची धूप पर
एक अहाता याद की छाँव से तर

बूंद बूंद रिसती तन्हाई की गुलकंद

टूटते तारों की अनसुनी हसरतें

दफ़अतन मन की दरारों से झांकती तुम्हारी आँखें

इश्क़ से महकता एक नुमाया कोना

सूखे फूलों के डूबते साए

और भी न जाने क्या क्या समेट लूँ 

ज़िन्दगी की टोकरी में 
मगर

इन सब पर भारी पड़ जाता है

एक ख़याल

तुम्हें बाँहों में भर लूँ

*

जाने कैसा ये मंज़र है

आँखें खोलने को भी जी नहीं करता

अंगड़ाई भी अटक सी जाती है कहीं बीच में

याद की एलबम में तुम्हारी तस्वीर दिखते ही

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वैसे याद की एलबम में झांकते ही न जाने क्या क्या याद आया। ये जो इतना फासला तय कर लिया है कि दूरियों का एहसास भी नहीं बचा। अब नज़र आया हल्का हल्का कि कैसे वो दिन थे आहिस्ता चलते संभलते फिसलते सावधान करते और ढेर सारे इंतज़ार और हलकी हलकी आस बंधाते। शुक्र है कि इंतज़ार अब भी ढेर सारा ही है पर आस गहरी हो चुकी है, इतनी कि किसी संदेह की कोई जगह नहीं बची। उन नर्म यादों का एक फाहा हाथ लगा है…

इन उनींदी आँखों को ख़्वाब तेरा है

ये आँखों की उनींदी

ये बेतरतीब बिखरे ख़याल

ये ख़्वाब और ख़्वाब का इंतज़ार

सब असबाब तेरा है

ये अटकी हुई साँसें

साँसों की उलझन

उलझन में बेचैनी

ये कुछ धधक रहा सा भीतर

सब जुटाया है तूने

फिर न जाने क्यों ये हाल मेरा है

धुंध

तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चाँद निकला- गुनगुनाता हुआ एक मनचला झूमती हवा सा गुज़रा।
उसे यूं लगा जैसे वक्त ने खुद को दोहराने की ठान रखी हो आज।

वो याद जब वह काले रंग के सलवार कमीज़ में जल्दी जल्दी कदम बढ़ाती मन ही मन क्लास में अपने देर से पहुँचने की वजह बताने के लिए कोई बहाना ढूँढ रही थी, तभी कहीं से ये गाना सुनाई पड़ा था। आवाज़ पास आ रही थी, एक अल्हड़ लड़की उससे टकराई थी और एक समझदार सा दिखने वाला लड़का उस पर चिल्ला रहा था. उसने भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

और बोल पड़ी, “ओ ये धौंस किसी और पर दिखाना, अपनी इस छमिया से बोल देखकर चले”

“मुँह सभालकर बातकर ये मेरी बेस्टफ्रेंड….”

“जा जा बड़ा आया बेस्ट फ्रेंड वाला”

इस चक्कर में उसकी देरी के कुछ पल और बढ़ गए थे। और आज भी उसकी देरी के पल बढ़ते जा रहे थे पर वह मुस्करा रही थी। उसे अब किसी को कोई बहाने नहीं बताने थे, सिर्फ अपने अलावा।

तस्वीर: नवंबर 2014, लालबाग पैलेस, इंदौर

तूने काहे को दुनिया बनाई

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रात रोज़ हमें डसती है और हम मृत पाए जाते हैं ज़िन्दगी की गोद में. सुबह संजीवनी फूंकती है और हम दौड़ने लगते हैं समय की सड़क पर. और फिर भी हम सोच पाते हैं कि हमें भविष्य में क्या करना है, हम सपने देखते हैं और तो और उनके पूरे होने की उम्मीद करते हैं, वो भी बेख़ौफ़. कभी कभी सोचती हूँ कि ईश्वर ने ये दुनिया क्यों बनाई होगी और वो कौन सी बात होगी कि वे इस दुनिया को कायम रखे हुए हैं, फिर लगता है शायद मनुष्य का यही दुस्साहस देखना उन्हें अच्छा लगता हो.

कपडे सुखाने की तार पर एक हवा में निलंबित घोंसला था जो खूबसूरत नहीं था उसमें चींटियों के घर तक नज़र आ रहे थे, कुछ दिन बाद समझ आया कि वो चमगादड़ जैसे किसी जीव का घोंसला था, जो कुछ दिन घर खाली रहने की वजह से उसने बना लिया होगा. लगभग उसी के नीचे तुलसी का एक पौधा रखा था, मगर शुक्र है कि पौधे को इस बात से तकलीफ नहीं थी, हम इंसानों की तरह.

सुबह जब पंछियों में संजीवनी फूंक चुकी होती है और वो उसका साथ दे रहे होते हैं ठीक तभी इन्सान के भ्रम भी फिर से जी उठते हैं. जीवित होते ही हम संजीवनी के चमत्कार को अंगड़ाई से झटक देते हैं और फिर लगा लेते हैं, अपने निर्धारित नियम, रीतियों और परम्पराओं के चश्मे जिनसे दुनिया उसी रंग की दिखाई देने लगे जैसे हम उसे देखना चाहते हैं.

रोज़ मरने और जी उठने के बावजूद भी, सबकुछ भला ही था जीवन में बस ईश्वर को मौहब्बत का इत्र नहीं छिडकना चाहिए था कि इंसान उसके लायक नहीं है. उसके लिए हर मंजिल कुछ समय के बाद एक गुज़र चुके मील के पत्थर से ज्यादा कुछ नहीं होती. हर सफ़र मुख़्तसर है और हर हासिल नैफ्थेलीन की गोली.

ये सब लिखते हुए भी मन के सवाल जारी हैं कि क्या हुआ है मेरी जान क्यों खफा हो? क्या करें कि मन के पास आज सिर्फ सवाल और उलाहनों के अलावा कुछ नहीं है. आज रात भी मुझे डसना नहीं चाहती, जाने ईश्वर को मुझसे इतनी उम्मीद क्यों है? मुझे अचरज होता है कि ये सवाल रोज़ क्यों नहीं उठते फिर याद आता है कि मैं भी तो इन्सान ही हूँ.

मिल जाए तो मिट्टी है

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जोदि तोर दोर्श्ने केउ ना आशे तौबे एकला चलो रे…

रबीन्द्र नाथ ठाकुर जी का लिखा बांग्ला गीत अमिताभ जी की आवाज़ में बज रहा है. रात आहिस्ता बढ़ रही है और खोल रही है एक एक कर वो सारे ताले जो मैंने कुछ सवालों पर लगाए हुए हैं. क्या सबके साथ चलते हुए भी तनहा चलना ही इन्सान की नियति है वो जिसे पा लेना एक सपने से ज्यादा कुछ न हो और न हासिल कर पाने का आभास मात्र आँखों के सामने अँधेरा कर दे, अगर वो मिल जाए और एक दिन वो होकर भी न रहे आसपास, क्या इससे बड़ी त्रासदी कोई होती होगी?

वो जिसके लिए कभी सारी दुनिया सिर्फ आपमें समाती हो, वो जिसे पाने के लिए आपने सचमुच सात आसमान एक किए हों, वो जो ईमानदार हो, पूरे सौ टके केवल आपका हो मगर एक अनकही मजबूरी के तहत, जो दवा तो हो मगर सांस में अटकी किसी छोटी गोली की तरह.

क्यों इस जहां में हम उनसे चाहते हुए भी इतना तक नहीं कह पाते कि आप आज़ाद हैं, कोई ज़ोर नहीं है.

मैंने एक कथा सुनी थी बचपन में शायद कोई व्रत कथा थी, बड़ी धुंधली सी याद है, एक व्यापारी था जो विदेश से अच्छी खासी कमाई करके जलमार्ग से अपने शहर की ओर लौट रहा था, उसका जहाज़ भटक जाता है. एक भिक्षुक उसकी पत्नी से ख्वाब में कहते हैं कि, तुम्हारे पति का जहाज़ भटक गया है तुम अमुक देवता की पूजा करो, तो वे लौट आएँगे, तब पुनः प्रतिसप्ताह उस एक विशेष दिन कथा का पाठ कर वही पूजा करना. वह धर्मपरायण स्त्री उनके कहे का पालन करती है और सचमुच उसके पति लौट आते हैं अपने भरे पूरे जहाज़ के साथ, परन्तु उसके बाद स्त्री कथा और पूजा करना भूल जाती है, तब उसके पति के जहाज़ पर मौजूद सारी धन सम्पदा घासफूस के ढेर में बदल जाती है.

मन पूछता है क्या हमारे भरे पूरे जहाज़ पर सारी दौलत का माटी हो जाना किसी रूठे देव का श्राप है?

‘दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है
अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है’

~निदा फ़ाज़ली

आई हैव टू

 

आँखों से आँखों तक का सफर, न जाने किसने पहले तय किया या कुछ दूर तुम चले कुछ दूर मैं, तब तो यह उलझन न थी कि, तुम चल रहे हो या नहीं, फिर आज यह अभिमान क्यों है?

क्या अब मेरे साथ समय बिताने का मन नहीं होता या शायद मेरे होने न होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। ऐसा क्या है, जो पहले था पर अब नहीं है। ये कैसा खालीपन है?

03.05.2016

क्यों ऐसा वक़्त देखना पड़ता है इन्सान को कि आपको सवाल करना पड़े, कि क्या अब भी लगाव बाकी है, जो सपने कभी सपने थे क्या उनके पूरे होते ही उनसे अपेक्षित और संभवतः मिलने वाली खुशियाँ भी कहीं वाष्पीकृत हो जाती हैं. क्यों अचानक सारे रास्ते बंद नज़र आते हैं और जिस रास्ते आप चल रहे हों वो अपनी ख़ुशी नहीं एक बंधन भर रह जाए.

कभी सोचकर देखें तो लगता है, शायद ठीक ही है क्योंकि हर व्यक्ति के साथ लगभग ऐसा ही है, हाँ कुछ लोग सच बोलकर दुखी कर देते हैं. पर हर वो हादसा जो अमूमन सब पर बीते क्या वो सही सिद्ध हो जाता है?

कभी कभी कोई कहानी ही ख्यालों कि बेल पर उगे सवालों को छेड़ देने के लिए काफी होती है, वो बेवजह बरस पड़ते हैं. और दिल में दबे-छिपे अक्षर आखों की स्क्रीन पर चमकने लगते हैं. फिर उस पर कोई साफ़ साफ़ कह दे, तो वह कानों के कीबोर्ड पर इन दबे छिपे अक्षरों के लिए कण्ट्रोल बी का काम करते हैं, और वही कई गुना बड़े बोल्ड फॉन्ट में नज़र आने लगता है, जो आप जानकर भी स्वीकारना नहीं चाहते.

कई बार लगता है कि सभी को शायद चुकाना पड़ता है, रिश्तों का मोल, खुद को खर्च करके, फिर कोई ख़ुशी ख़ुशी करे या उदासीन भाव से आई हैव टू कहकर

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तस्वीर: 14 जनवरी २०१६, इंसान दोष दे भी तो किसे, सच कहने वाले को या उस खुदा को जो हर रात के बाद उम्मीद भरी सुबह से जगाए और बार बार याद दिलाता रहे कि यही जीवन है.

क्या तुम ये जानते थे

दिन चलता रहा किसी तानाशाह की तरह
समय की सिगरेट जला

उड़ाता रहा यादों का धुआं

उस लू में झुलसती रही मैं

हसरतों में भीगी

मांगती रही एक अदद शाम

*

दिल ये बेईमान बड़ा है

हड़प लेना चाहता है पूरा का पूरा तुम्हें

यूँ किश्तों में अब ये बहलता नहीं

दौड़ जाना चाहता है चाहतों के पार

मगर निरा मूरख है बेचारा

भूल जाता है खुद को भी

बस एक तस्वीर देखकर

*

नहीं करना चाहती मैं तुम्हारा इंतज़ार

मगर

मेरी सुनता कौन है

न दिल, न आँखें और न तुम

*

वो तो अच्छा हुआ

ये इंतज़ार साथ है

जाने क्या होता 

इसके बिना तन्हाई में

*

समय ठहरता नहीं 

ये बात सब जानते हैं

पर कटता नहीं इंतज़ार

किसी भी छुरी से

क्या तुम ये जानते थे

——-

यहाँ एक दो दिन से रात के समय बेमौसम बरसात हो रही है। रात में किसी भी पहर आँख खुली तो कुछ भी दिखाई देने से पहले टिटहरी की आवाज़ सुनाई देती है, जैसे कह रही हो कि, देखो मैं जो चाहती थी वही हो रहा है। पर, कुछ ख़्वाब ख्याल फिर भी सूखे रह जाते हैं।

काश!

तस्वीर: 14 नवंबर 2016 की है, जब चाँद 14 गुना बड़ा और कुछ गुना ज्यादा चमकीला दिखाई दिया था।

आने वाला कल बाक़ी है

आज फिर पूछा है खुद से 
आखिर चाहते क्या हो

क्यों खफ़ा हो खुद से, सबसे

काम कब कम थे

हाँ रंग बदल जाते हैं

पर ज़िन्दगी ने किसे मोहलत दी है ठहर कर देखने की, क्यों सोचना है कि दुनिया क्यों भाग रही है मगर तुम इस दौड़ में शामिल क्यों हो ये जानना ज़रूरी है।

पता है कई बार भीड़ तुम्हें अपने साथ ठेल कर ले जाती है पर क्या तुममें उससे निकल पाने का साहस है अच्छा साहस एक तरफ, क्या इच्छा है?

05.02.17

आज फिर से लगभग यही सवाल, और मैं लाजवाब। सचमुच कभी कभी दिन भर में कोई अच्छी बात नहीं होती। सिवा इसके कि, सांसें चल रही हों, घर पर सभी स्वस्थ हों, बच्चा रोता हो पर किसी छोटी मोटी ज़िद पर, और पानी खाना नौकरी सब सही सही चल रहा हो। 

पर मन के लोभ कहाँ कम होते हैं। आज की सुबह शुरू हुई बेटी साहिबा की स्कूल न जाने की ज़िद से और पूरे ज़ोर और रोने धोने के साथ वाली ज़िद। नतीजा काम पर देरी, वहां ढेर सारी फाइल्स और डेड लाइन्स। सब बिलकुल बेकार और दिखावा, जो किस तरह और कब तक बरदाश्त किया जाए, ये नामालूम है। 

ख़ैर, जाने देते हैं, पर बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, घर पर बिजली गुल, और इस युग में तो बिन बिजली सब सून। बहरहाल, आज के दिन को बुरा कहने में कोई कसर रह जाती, अगर जिस आवाज़ से सुकून मिलता है, वह कानों पर बरस पाती मगर दिल यही गाता रह गया, ‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले…’

फिर भी जाने क्यों

एक आस जाती नहीं

कि आने वाला कल बाक़ी है

तुम आना

वक़्त की मियाद ख़त्म हुई
दरबान ने हुक्म सुना दिया
एक सेल के क़ैदी ने
दूसरे सेल के क़ैदी की ओर निहारा
उम्मीद से
और कहा
जाने कब फिर हुक्मरानों की मेहरबानी हो
और हम बच पाएं अपने ही बुने एकांत से
जाने कब कुछ पल साझा कर पाएं
दूसरा क़ैदी मुस्करा रहा था
पहले ने कहा
अब भी मुस्करा रहे हो
दूसरे ने कहा
हमारा यही होना है
ये नियति हमने न चाहकर भी ख़ुद चुनी है
तो फिर डर कैसा और शिक़वे क्यों
और फिर खुशियाँ कब और किसे मुफ़्त मिलती हैं
हमारी खुशियों की क़ीमत यही होगी
कि खुश रहना होगा हर हाल
जी चाहे या
इतनी देर चुप्पी ओढ़े खड़ा दरबान बोल पड़ा
और फिर अभी ज़िन्दगी बाक़ी है
बस फिर हाथों में हथकड़ियाँ
रुक रुककर चलती साँसे
और इंतज़ार की घड़ियाँ गिनती
दो जोड़ी आँखें
अक्टूबर 2016
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तुम आना
जब शाम के माथे लगी हो
सूरज की लाल बिंदी
और वो तैयार हो रही हो
सितारों वाली काली चुनरी और चमकीले चंदा की बिंदी लगाने को
तुम आना
कि ये शाम मुझे बड़ा सताती है
ये रोज़ सज संवरकर तुम्हें देख आती है
हवाओं का आँचल लहराकर
पंछियों की आवाज़ में गीत सुनाती है
बड़ी ज़ालिम है मुझे कुछ नहीं बताती है
तुम आना
एक दिन
इस तरह
कि शाम ढूंढती फिरे तुम्हें
भूल जाए सजना
और ठहर जाए
जिस तरह मैं ठहरी हुई हूँ!
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आनंद

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टूटी हड्डियों के कराहने से, टूटे दिलों का दर्द ज़्यादा था। पर ये कोई नई बात न थी, हॉस्पिटल के लिए।

श्यामल रंग, मुस्कराता चेहरा, मदद के लिए उठे हाथ, आनंद नाम था उसका। भोर से पहले ही उसका नाम शुरू हो जाता था। रात आते आते कितनी ही आँखें उसे दुआएं दे जाती थीं, क्योंकि होंठों का काम बोलना सही पर, सच आँखें ही बोलती हैं। उसके घर के एक तरफ सुबह उगती और दूजी तरफ शाम में ढल जाती। उसकी ज़िन्दगी इस सुबह – शाम के बीच अटकी दोपहर सी हो गई थी, जहाँ साए तक छोटे होते हैं। आनंद के पास कोई नहीं था, वैसे भी जिनके पास कुछ नहीं होता, उनके नातेदार भी कम ही होते हैं, फिर उसके तो माँ-पिता भी न थे।

वो पेंसिल जैसा था शायद, वो बोल नहीं सकता था पर फिर भी बहुत कुछ कह जाता था।

ज़िन्दगी की कॉरिडोर पर चलते चलते एक रोज़ उसे अपना नाम सुनाई पड़ता है। कोई अजनबी आवाज़ थी, उसे लगा कोई किसी और को बुला रहा है। चार कदम चलने पर फिर से उसने सुना, आनंद, अब वह पलटा। उसे कोई जाना पहचाना चेहरा नहीं दिखा। सफ़ेद रंग की कमीज़ पहने एक लड़की ने फिर पुकारा, “आनंद यहाँ!”

वह उस ओर चल देता है। उसे ख्याल आता है कि, हाँ ये तो कल ही यहाँ दाखिल हुए हैं। उसे, उस शेयर्ड रूम के दरवाज़े पर पहुँचते पहुँचते एक और नाम सुनाई पड़ता है, श्यामली। एक बुज़ुर्ग ने उस लडक़ी को पुकारा था। “हाँ बाबा” कहते हुए वह लड़की भीतर चली जाती है। आनंद दरवाज़े पर रुक जाता है। बाबा जो श्यामली से कहते हैं, वह उसे कुछ खास समझ नहीं आता, वह इंतज़ार करता है।